राजनीतिक और सामाजिक विमर्थ में बढ़ते नैतिक पतन के दौर में युवा कवियत्री/शायरा स्मृति भोकर का पहला काव्य संग्रह ‘अखलाक: सियासतनामा’ एक उम्मीद जगाता है। स्मृति की कविताओं में जहां देश की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणियां की गई हैं, वहीं समाज में हो रहे बदलावों के बीच बढ़ती युवाओं बेचैनी को उकेरा गया है। उनकी शायरी कभी इकबाल से प्रभावित दिखती है तो कभी फैज़ से, लेकिन रोचक बात यह है कि उनकी शायरी में भारी-भरकम शब्दों और विषयों के बजाए आम बोलचाल की जुबान में रोजमर्रा की जिंदगी को केंद्र में रखा गया है<br /><br />
