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#MediaRumble: पार्टी का पत्रकार या पत्रकार की पार्टी?

2021-11-10 0 Dailymotion

आज़ादी के आंदोलन से जुड़े तमाम बड़े नेताओं ने अख़बार या पत्रिकाएं निकाली. महात्मा गांधी हों या आम्बेडकर हो सबके अपने-अपने प्रकाशन हुआ करते थे. लेकिन तब स्थितियां दूसरी थी, पत्र-पत्रिकाएं उनके राजनीतिक आंदोलन का एक अहम औजार होता था. उन लोगों ने एक विदेशी सत्ता से लड़ने के लिए पत्रकारिता को एक औजार बनाया था. आज भी हम पाते हैं कि तमाम राजनीतिक दलों की अपनी पत्र-पत्रिकाएं हैं, पर वो असल में कर क्या रही हैं. एक पत्रकार जिसके पास अपना ओपिनियन होता है, उसके अपने विचार होते हैं. कई चीजों से वो सहमत नहीं होता. आलोचना करता है, लेकिन एक पार्टी या किसी संस्थान के प्रकाशन से जुड़ने पर क्या उस पत्रकार के अंदर अपनी स्वतंत्र चेतना, अपने निजी विचारों के लिए कोई जगह बचती है?<br /><br />इन चुनौतियों और इससे जुड़ी सीमाओं को लेकर द मीडिया रम्बल में एक विशेष चर्चा का सत्र आयोजित हुआ. इस सत्र का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. इसमें भाकपा (माले) की पत्रिका लिबरेशन की एडिटर कविता कृष्णन, सीपीआई से जुड़े और युगांतर पत्रिका के संपादक रह चुके भालचंद्र कांगो, नेशनल हेराल्ड के संपादक ज़फ़र आगा और बीजेपी के मुखपत्र कमल संदेश के संपादक शिव शक्तिनाथ बख्शी ने हिस्सा लिया.<br /><br /><br />To watch this and many more videos, click on http://www.newslaundry.com/

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