कुरुवंश के राजा शांतनु का विवाह गंगा से हुआ था। शांतनु-गंगा की 7 संतानें हुई, जिन्हें गंगा ने बहा दिया। 8वीं संतान होने पर शांतनु ने गंगा को रोक लिया। गंगा ने विवाह के पहले शर्त रखी थी- सम्राट संतान के बारे में नहीं पूछेंगे। शांतनु ने संतान को बहाने से रोका तो गंगा चली गईं। गंगा के चले जाने के बाद शांतनु उदास रहने लगे। 8वीं संतान का नाम देवव्रत था।<br /><br />देवव्रत बड़े हो रहे थे, लेकिन पिता उनसे विमुख थे। देवव्रत ने कई ऋषियों से अनेक शिक्षाएं लीं। देवव्रत जब महल आए तो पिता उदास दिखे। देवव्रत ने अमात्य से पिता के अवसाद का कारण पूछा। अमात्य बोले- पिता को काम पीड़ा है। शांतनु एक युवा लड़की से प्रेम करते थे। शांतनु को केवट कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया था। देवव्रत के चलते वे उससे शादी से कतरा रहे थे। <br /><br />देवव्रत ने लड़की के पिता से मिलने की ठानी। एक दिन सुबह देवव्रत केवट के घर पहुंचे। देवव्रत ने केवट से पिता के लिए उनकी बेटी चाही। केवट ने कहा- आप शक्तिशाली हैं, लेकिन विवाह के बाद मेरी बेटी और उसके बच्चों के भविष्य का क्या होगा? केवट ने कहा- युवराज आप हैं, राजा भी आप ही होंगे। <br /><br />तब देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली कि बेटी का अधिकार कोई नहीं छीनेगा। मैं आजन्म अविवाहित रहूंगा, मेरा कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा। इसी प्रतिज्ञा के साथ देवव्रत भीष्म हो गए। भीष्म ने सत्यवती, उनके पुत्रों की रक्षा की। <br /><br />भीष्म महाप्रतापी होते हुए भी गलतियों पर मौन रहे। उत्तराधिकार अस्वीकार करना उनकी बड़ी भूल थी। महाभारत की जड़ में असल में भीष्म प्रतिज्ञा ही थी। भीष्म महानतम थे, पर उन्हें वो दर्जा नहीं मिला।<br />
