भीलवाड़ा। भारतीय सेना की एक टुकड़ी वर्ष 2004 में रास्ता भटक पाकिस्तान सीमा में चली गई। पाक से फायरिंग, मिसाइलें व राकेट लॉन्चर दागे जा रहे थे। दुश्मन फौज से बचने को बरसाती नाले में छलांग लगा दी। भगवान की कृपा रही कि जान बच गई। यह कहना है जसवंत सिंह राजपूत का, जो सेना से रिटायर होने के बाद अब मांडल थाने में कांस्टेबल हैं।<br /><br />पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में मिली<br />देवगढ़ निवासी 43 वर्षीय जसवंत बताते हैं कि वर्ष 1999 में करगिल युद्ध के दौरान सेना में चयन हुआ तो खुशी का ठिकाना नहीं था। पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर में मिली। पाक के खिलाफ लड़ना चाहता था, लेकिन मौका नहीं मिला। फिर फरवरी 2004 में जम्मू-कश्मीर के नोसेरा सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर पाक ने हमला कर दिया। हमारे दो जवानों की गर्दन काट दी। <br /><br />हमले में सात जवान शहीद<br />जवाबी कार्रवाई के लिए भारत ने 10 जवानों का दस्ता बनाया, जिसमें मुझे शामिल किया। यह दस्ता रास्ता भटक पाक में चला गया। उस हमले में सात जवान शहीद हो गए। मेरे समेत तीन जवानों ने बरसाती नाले में कूदकर जान बचाई। तीन-चार दिन बाद आई हमारी टुकड़ी ने तीनों को बाहर निकाला। पंजाब के आरआर चिकित्सालय में भर्ती कराया। यहां डेढ़ साल कोमा में रहा। चिकित्सक ने एक तरह से बचने से मना कर दिया। होश आया, तब काफी कुछ बदल चुका था। दोनों साथी इलाज के दौरान शहीद हो चुके थे। वर्ष 2007 तक सेना में रहे।<br /><br /><br />छह माह परिवार को नहीं लगा पता<br /><br />जसवंत की शादी वर्ष 2001 में राजसमंद के कामलीघाट हुई। सात फेरों के तत्काल बाद फौज से बुलावा आया। पाक सीमा पर घटनाक्रम की सूचना परिजन को छह माह बाद मिली। कोमा में गया तो पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। स्वस्थ होने के बाद परिजनों ने वर्ष 2007 में दूसरी शादी कराई। अभी उनके बेटा-बेटी है । अभी शरीर से वर्ष में एक बार रक्त बदलना पड़ता है । सप्ताह भर की प्रक्रिया दिल्ली में होती है, जिसका खर्चा सरकार उठाती है । सिंह ने बताया कि स्वास्थ्य परीक्षण में फिट होने के बाद नवम्बर 2008 में पुलिस की नौकरी चुनी। उसके बाद पोस्टिंग भीलवाड़ा जिले में हुई।
