<p>राजस्थान के जयपुर से ध्रुपद गायकी का पुराना नाता है. यहां के बाबा बहराम खान डागर के वंशज इस विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं. सीऊद्दीन डागर को साल 2010 में इस गायकी के लिए पद्म श्री अवार्ड भी मिल चुका है. इस गायकी को लेकर आज की युवा पीढ़ी क्या सोचती है, इस सवाल का जवाब देते हुए अनीसीद्दीन डागर कहते हैं कि युवा पीढ़ी शास्त्रीय संगीत को भूली नहीं है लेकिन भटक जरुर गई है. वरिष्ठ पत्रकार इकबाल अहमद खान जो आर्ट और कल्चर पर 45 साल से लिख रहे हैं और 50 साल से ध्रुपद भी इस हवेली में सीख रहे हैं, इसके महत्व को बताते हैं कि ये गायकी साम वेद से निकली है, देवी देवताओं के लिएं गाई जाती है. भगवान को शयन से उठाना, उनको नहलाने और श्रंगार करने से संबंधित है, ध्रुपद गायकी तमाम गायकी की मां है. वैसेे तो ध्रुपद गायकी तबला सहित अलग-अलग वाद्य यंत्रों से की जाती है. लेकिन ये घराना ध्रुपद गायकी के लिए तानपुरा का इस्तेमाल करता है.</p>
