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बंधुआ मजदूर से बदलाव के अग्रदूत बनने की कहानी, रीतांजलि और संतोषिनी ने लिखी अनोखी दास्तां

2026-02-10 2 Dailymotion

<p>ओडिशा के बलांगीर के रीतांजलि तामिया गांव में अगर किसी से प्रति नाइंसाफी होती है तो लोग रीतांजलि राणा को याद करते हैं. 25 साल की रीतांजलि राणा पारा-लीगल वॉलंटियर हैं, जो लोगों को इंसाफ दिलाने में मदद करती हैं. उन्होंने एक ब्यूटी पॉर्लर भी खोल रखा है, जहां हर महीने करीब 40 हजार रुपये कमा लेती हैं. यहां से जो समय बचता है वो बंधुआ मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराने में खर्च करती हैं. 2012 तक रीतांजलि का परिवार भी 70 रुपये दिहाड़ी पर बंधुआ मजदूरी करता था. सरकार ने उन्हें इससे मुक्त कराया. इसके बाद रीतांजलि ने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की. अब वो ना सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी हैं.. बल्कि समाज में बदलाव का अगुवा बनी हैं. रीतांजलि अब तक 4 हजार लोगों की मदद कर चुकी हैं. लोईसिंघा की संतोषिनी राउत की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.  </p><p>बंधुआ मजदूर से बदलाव के अगुवा बनने तक की इनकी कहानी लोगों के लिए प्रेरणा देनेवाली है. इन्होंने सरकार की विभिन्न योजनाओं और ट्रेनिंग का फायदा उठाकर समाज में बड़ा बदलाव किया.    </p>

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