<p>सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने मंगलवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि एक महिला के तौर पर बोलते हुए, अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) ऐसा नहीं हो सकता कि वह तीन दिनों के लिए लागू हो और चौथे दिन छुआछूत खत्म हो जाए. सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की. इसमें केरल के सबरीमला मंदिर और विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मुद्दे शामिल हैं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें शुरू कीं. मेहता ने कहा कि अदालतें 'धार्मिक संप्रदायों' और 'अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं' को उस तरह सीमित दायरे में परिभाषित नहीं कर सकतीं, जैसा कि सितंबर 2018 के सबरीमला फैसले में किया गया था. सितंबर 2018 में, सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से दिए फैसले में सबरीमला के अय्यप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था. अदालत ने माना था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक थी. नवंबर 2019 में, तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की एक अन्य पीठ ने 3:2 के बहुमत से विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया.</p>
