<p>पश्चिम बंगाल में भारत-नेपाल सीमा पर स्थित बेंगईजोत नाम का एक छोटा सा गांव दार्जिलिंग के पास होने के बावजूद पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र नहीं है. लेकिन ये गांव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक अतीत की याद दिलाता है। खास तौर पर नक्सलबाड़ी आंदोलन की, जो देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गया था.</p><p>माना जाता है कि 1967 में नक्सली आंदोलन की शुरुआत बेंगईजोत से ही हुई थी. इसे मुख्य रूप से कृषि संबंधी असंतोष और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित एक धुर वामपंथी, सशस्त्र विद्रोह के रूप में देखा जाता है. स्थानीय युवाओं का कहना है कि कानू सान्याल जैसे नेताओं के नेतृत्व वाले इस आंदोलन का अब इस क्षेत्र में कोई प्रभाव नहीं है. </p><p>हालांकि इस गांव में मौजूद कार्ल मार्क्स और चारू मजूमदार की प्रतिमाएं इस बात का संकेत देती हैं कि आंदोलन को पूरी तरह से भुलाया नहीं गया है. उस आंदोलन की यादों को खेमू सिंघा जैसे बुजुर्ग आज भी याद करते हैं, वे कभी इस आंदोलन से घनिष्ठ रूप से जुड़े थे. सिंघा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सदस्य हैं, जिसकी स्थापना चारू मजूमदार ने की थी. वामपंथी विचारधारा से उनका जुड़ाव इस बात से झलकता है कि वे आज इस आंदोलन की स्थिति का आकलन कैसे करते हैं. </p>
