<p>शुक्रवार को देश के ज्यादातर हिस्सों में मुहर्रम मनाया जा रहा है. राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ताजिये बनाने की दो अनोखी परंपराएं अपने इतिहास, कारीगरी और लंबे समय से चली आ रही विरासत की वजह से लोगों का ध्यान खींच रही हैं. ताजिया- बांस, लकड़ी और रंगीन कागज या पन्नी से बना एक खूबसूरत मकबरा होता है, जिसे मुहर्रम के दौरान शिया समुदाय के लोग पैगंबर मुहम्मद के नवासे, हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में निकालते हैं और शोक मनाते हैं. राजस्थान के जयपुर में त्रिपोलिया बाजार में मौजूद सोने और चांदी का शाही ताजिया, मुहर्रम की शाही विरासत और शहर की सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक है. </p><p>ज्यादातर ताजियों को जुलूस के बाद कर्बला मैदानों में ले जाया जाता है, लेकिन जयपुर के शाही ताजिये को वापस लाया जाता है और अगले मुहर्रम तक सावधानी से संभालकर रखा जाता है. इसी तरह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में भी सदियों पुराने एक ताजिये को एक ही परिवार की कई पीढ़ियां संभालकर रखती आ रही है. सदियों पुराने इस ताजिये को इमामबाड़े में रखा हुआ है. काफी पुराना और बहुत ज्यादा वजन होने की वजह से इसे अब मुहर्रम के जुलूस में नहीं रखा जाता है. इसीलिए लोग इमामबाड़े में जाकर हजरत इमाम हुसैन के प्रति अपना दुख जाहिर करते हैं.</p>
