<p>असम के सबसे मशहूर पारंपरिक वाद्ययंत्रों में से एक, 'बिहू पेपा' को 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन' यानी 'जीआई टैग' मिला है. इससे 'बिहू पेपा' को अपनी अनोखी सांस्कृतिक विरासत के लिए राष्ट्रीय पहचान मिली है. गोलाघाट में इस घोषणा का गर्व के साथ स्वागत किया गया है, जहां कारीगरों की कई पीढ़ियों ने हाथ से इस वाद्ययंत्र को बनाने की परंपरा को जिंदा रखा है.</p><p>पारंपरिक रूप से भैंस की सींग से बनाए जाने वाले और बांस के माउथपीस (मुंह से फूंकने वाले हिस्से) वाले 'पेपा' को पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकों का इस्तेमाल करके बहुत बारीकी से हाथ से बनाया जाता है. कारीगरों और लोक कलाकारों का मानना है कि जीआई पहचान से इस परंपरा को बचाने, इसके बारे में जागरूकता बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों को इस लोक वाद्ययंत्र को सीखने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी.</p>
